रत्नसंघ

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नाम: पूज्य श्री कुशलचन्दजी म.सा.

माता का नाम: स्व. श्रीमती कानूबाइ्रजी

जन्म स्थान: रिंया सेठों की

देवलोक तिथि: विक्रमसंवत् 1840ज्येष्ठकृष्णा षष्ठी

पिता का नाम: स्व. श्री लादूरामजी चंगेरिया

दीक्षा का स्थान: रिंया

दीक्षा का स्थान: रिंया

कुशलवंश परम्परा के प्रथम आचार्य पूज्य श्री गुमानचन्द्रजी म.सा. माहेश्वरी जाति के सम्पन्न सद्गृहस्थ थे। अपनी मातुश्री के स्वर्गगमन पश्चात् पिता-पुत्र (श्री अखेराजजी व श्री गुमानचन्द्रजी) परम्परागत रीति के अनुसार अस्थियाँ विसर्जित करने पुष्कर गए। लौटते समय मेड़ता नगर में जहाँ उस समय उत्कृष्ट चारित्र के धनी पूज्य श्री कुशलचन्द्रजी म.सा. विराज रहे थे, दर्शन-वन्दन के साथ पिता-पुत्र में भक्ति भावना का ऐसा संचरण हुआ कि उन्हें संसार के प्रति उदासीनता हो गई। वि.स. 1818 की मार्गशीर्ष शुक्ला एकादशी को पिता-पुत्र दोनों ने पूज्य श्री कुशलचन्द्रजी म.सा. के मुखारविन्द से पावन प्रव्रज्या अंगीकार कर ली।
पूज्य आचार्य श्री गुमाचन्दजी म.सा. ने अपने लगभग बीस वर्ष की अवस्था वाले शिष्यरत्न श्री रत्नचन्द्रजी म.सा. के सहयोग से वि.स. 1854 में भोपालगढ़ आषाढ़ कृष्णा द्वितीया को 14 संतों के साथ 21 बोलों की मर्यादा कर क्रियोद्धार किया, वह कुशलवंश परम्परा की विशेष उपलब्धि है। पूज्य श्री रत्नचन्द्रजी म.सा. की यश-कीर्ति के प्रभाव से कुशलवंश परम्परा रत्नवंश के नाम से विख्यात है। उत्कृष्ट क्रियापात्र पूज्य आचार्य श्री गुमानचन्द्रजी म.सा. का वि.स. 1818 से 1858 तक 40 वर्ष पर्यन्त शासन प्रभावना का काल इस परम्परा की प्रमुख विशेषता है।

नाम: आचार्य पूज्य श्री गुमानचन्द्रजी म.सा.

माता का नाम: स्व. श्रीमती चेनाबाइ्रजी

पिता का नाम: स्व. श्री अखेराजजी लोहिया

जन्म स्थान: जोधपुर

देवलोक तिथि: विक्रमसंवत 1858 कार्तिक कृष्णा अष्टमी

दीक्षा का स्थान: मेड़तासिटी

देवलोक स्थान: मेड़तासिटी (जिला-नागौर)

कुशलवंश परम्परा के प्रथम आचार्य पूज्य श्री गुमानचन्द्रजी म.सा. माहेश्वरी जाति के सम्पन्न सद्गृहस्थ थे। अपनी मातुश्री के स्वर्गगमन पश्चात् पिता-पुत्र (श्री अखेराजजी व श्री गुमानचन्द्रजी) परम्परागत रीति के अनुसार अस्थियाँ विसर्जित करने पुष्कर गए। लौटते समय मेड़ता नगर में जहाँ उस समय उत्कृष्ट चारित्र के धनी पूज्य श्री कुशलचन्द्रजी म.सा. विराज रहे थे, दर्शन-वन्दन के साथ पिता-पुत्र में भक्ति भावना का ऐसा संचरण हुआ कि उन्हें संसार के प्रति उदासीनता हो गई। वि.स. 1818 की मार्गशीर्ष शुक्ला एकादशी को पिता-पुत्र दोनों ने पूज्य श्री कुशलचन्द्रजी म.सा. के मुखारविन्द से पावन प्रव्रज्या अंगीकार कर ली।
पूज्य आचार्य श्री गुमाचन्दजी म.सा. ने अपने लगभग बीस वर्ष की अवस्था वाले शिष्यरत्न श्री रत्नचन्द्रजी म.सा. के सहयोग से वि.स. 1854 में भोपालगढ़ आषाढ़ कृष्णा द्वितीया को 14 संतों के साथ 21 बोलों की मर्यादा कर क्रियोद्धार किया, वह कुशलवंश परम्परा की विशेष उपलब्धि है। पूज्य श्री रत्नचन्द्रजी म.सा. की यश-कीर्ति के प्रभाव से कुशलवंश परम्परा रत्नवंश के नाम से विख्यात है। उत्कृष्ट क्रियापात्र पूज्य आचार्य श्री गुमानचन्द्रजी म.सा. का वि.स. 1818 से 1858 तक 40 वर्ष पर्यन्त शासन प्रभावना का काल इस परम्परा की प्रमुख विशेषता है।